ख़ज़ाने की खोज
चार तनय आलस्य हज़ार,
लाख, हीरों के उड़ाए हार।
"मम्ता,क्या होवे इनका मेरे बाद",
सोच सोच के बीते साल।।
सोचते - सोचते पहुँचा खेत,
जोतने के लिए उठिया हल।
खोदते - खोदते आया उपाय ,
अब यही करेगा आलस हल।
दिन निकला , रात बीती,
रवि से चंद्र, चंद्र से रवि।
किसान की सेहत हुई ख़राब,
याद आया उसे वह उपाए अभी।।
बुलाया मम्ता को कहा डाला जो मन में था,
"बेटों, रह गया अब सिर्फ कुछ दिन है मेरा। ,
खेत के नीचे दबाया खजाना,
जरूरत पर उसे ही लेना। "
दिवस बीतते फूंकी चिता,
बेटे गए झट से खेत।
किया वही जो कुछ था सीखा
खोदा खेत पर कुछ नहीं दिखा।।
"माँ ये कैसा अनर्थ हो आया,
खेत के नीचे कुछ नहीं पाया।"
ममता खुश हुई और झट से बोली,
"खेत ही था खज़ाना उनका। "
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